JHARKHAND NEWS : दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, झारखंड आंदोलन और आदिवासी अस्मिता को मिला राष्ट्रीय सम्मान

RANCHI: झारखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक संरक्षक रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान प्रदान किया। शिबू सोरेन की पत्नी रुपी सोरेन ने उनकी ओर से यह सम्मान ग्रहण किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी एवं विधायक कल्पना सोरेन भी मौजूद रहीं।
केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शिबू सोरेन को पद्म भूषण देने की घोषणा की थी। आदिवासी समाज गरीबों वंचितों और शोषित वर्गों के अधिकारों के लिए उनके लंबे संघर्ष और सामाजिक योगदान को देखते हुए उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया।
11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने बचपन से ही आदिवासियों के शोषण जमींदारी व्यवस्था और विस्थापन की पीड़ा को करीब से देखा था। यही अनुभव उनके सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की नींव बने।
1970 के दशक में शुरू हुए ‘धान काटो आंदोलन’ ने उन्हें जननेता के रूप में पहचान दिलाई। उन्होंने महाजनी प्रथा और जमींदारों के खिलाफ संघर्ष करते हुए आदिवासियों और गरीबों की जमीन वापस दिलाने का अभियान चलाया। बाद के वर्षों में खनन परियोजनाओं और वन कानूनों के कारण हो रहे विस्थापन के खिलाफ भी उन्होंने जोरदार आवाज उठाई।
शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के माध्यम से अलग झारखंड राज्य की मांग को व्यापक जनआंदोलन का रूप दिया। उन्होंने लगातार यह सवाल उठाया कि खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र के मूल निवासी विकास से वंचित क्यों हैं।
दशकों तक चले संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में उनकी भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण उन्हें लोग प्यार से ‘गुरुजी’ और ‘दिशोम गुरु’ कहकर संबोधित करते थे।
शिबू सोरेन ने आदिवासी जमीनों को मुक्त कराने के लिए व्यापक अभियान चलाया और महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने नशामुक्त समाज के लिए लगातार जनजागरण अभियान चलाया तथा शराब और नशे को आदिवासी समाज के पतन का कारण बताया।
उन्होंने झारखंड आंदोलन को सभी धर्मों और समुदायों को साथ लेकर चलने वाला आंदोलन बनाया। पर्यावरण संरक्षण और जंगलों की रक्षा को उन्होंने आदिवासी अस्तित्व से जोड़ा तथा लोगों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम मानते हुए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा प्रसार के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किए।
धनबाद के टुंडी क्षेत्र में सामाजिक कार्यों शिक्षा खेती और पशुपालन को बढ़ावा देने के कारण लोगों ने उन्हें ‘गुरुजी’ कहना शुरू किया। वहीं जामताड़ा के चिरुडीह और आसपास के इलाकों में आदिवासियों के हकों की लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने लोगों को संगठित किया और त्वरित न्याय दिलाने का प्रयास किया। उनकी नेतृत्व क्षमता और जनसरोकारों के कारण आदिवासी समाज ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दी।
शिबू सोरेन झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। वे लंबे समय से किडनी समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। बेहतर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद भी उनका संघर्ष विचार और झारखंड आंदोलन में दिया गया योगदान लोगों को प्रेरित करता रहेगा।
शिबू सोरेन को मिला पद्म भूषण सम्मान न केवल एक व्यक्ति के संघर्ष का सम्मान है बल्कि झारखंड आंदोलन आदिवासी अस्मिता और सामाजिक न्याय की उस लंबी लड़ाई की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति भी है जिसका नेतृत्व उन्होंने दशकों तक किया।

