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JPSC घोटाले में लटकी अभियोजन स्वीकृति, तकनीकी शिक्षा विभाग बना बाधा…

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Jharkhand : झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की पहली और दूसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से जुड़े बहुचर्चित मेरिट घोटाले में अब तक न्याय की राह अटकी हुई है। वजह है अभियोजन स्वीकृति में हो रही देरी। बताया जा रहा है कि उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग जानबूझकर इस प्रक्रिया को टाल रहा है और जिन परीक्षकों पर आरोप हैं उनके खिलाफ अभियोजन की अनुमति सरकार को नहीं भेजी जा रही।

इस घोटाले में जिन परीक्षकों के नाम हैं वे राज्य के विभिन्न कॉलेजों में प्रोफेसर और लेक्चरर के पद पर कार्यरत हैं। इसलिए नियमों के तहत अभियोजन स्वीकृति के लिए उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग की मंजूरी जरूरी है। जबकि जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष, सदस्य और परीक्षा नियंत्रक जैसे सरकारी पदाधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति पहले ही दी जा चुकी है।

यह घोटाला झारखंड के इतिहास के सबसे बड़े भर्ती घोटालों में से एक माना जाता है। इस परीक्षा के जरिए प्रभावशाली परिवारों के रिश्तेदारों को नियमों के खिलाफ चयनित कराया गया और उत्तर पुस्तिकाओं में नंबरों की हेराफेरी की गई। जांच के दौरान तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप प्रसाद, प्रो. शांति देवी, डॉ. गोपाल प्रसाद सिंह, परीक्षा नियंत्रक एलिस उषा रानी समेत कई लोगों को जेल भी जाना पड़ा था। फिलहाल सभी जमानत पर बाहर हैं।

चयनित अभ्यर्थियों में राजनीतिक नेताओं के करीबी रिश्तेदार भी शामिल हैं जिनमें प्रशांत कुमार लायक, चिंटू दोराई बुरू, विकास पांडेय, मौसमी नागेश, मुकेश महतो, अरविंद सिंह, गीतांजलि, संगीता कुमारी, रजनीश कुमार सहित कई नाम प्रमुख हैं। हैरानी की बात यह है कि इन सभी को बिना कोर्ट के अंतिम फैसले के प्रमोशन भी मिलते रहे हैं और कुछ अब सेवा निवृत्ति के करीब पहुंच चुके हैं।

इस मामले की शुरुआत में जांच ACB ने की थी और बाद में मामला सीबीआई को सौंपा गया जिसने अदालत में चार्जशीट भी दाखिल की। लेकिन अभियोजन स्वीकृति की कमी के कारण अदालती कार्रवाई ठप है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अब इस देरी और विभागीय लापरवाही पर गंभीर संज्ञान लिया है। लेकिन जानकार मानते हैं कि जब तक सरकार स्पष्ट निर्देश नहीं देती और विभाग गंभीरता नहीं दिखाता तब तक यह मामला यूं ही लटकता रहेगा।