शिक्षक पात्रता परीक्षा में भाषाई भेदभाव? पलामू-गढ़वा के छात्रों ने उठाई भोजपुरी-मगही की मांग…

Jharkhand: झारखंड सरकार द्वारा शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) के लिए जारी क्षेत्रीय व जनजातीय भाषाओं की सूची को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विशेष रूप से पलामू और गढ़वा जिलों के युवाओं में इस निर्णय को लेकर भारी असंतोष देखने को मिल रहा है। सरकार ने इन जिलों के लिए स्थानीय भाषाओं के रूप में नागपुरी और कुडुख को अनिवार्य किया है जबकि इन क्षेत्रों में बोली और लिखी जाने वाली भोजपुरी और मगही भाषाओं को सूची से बाहर कर दिया गया है।
इस फैसले के खिलाफ छात्रों और युवाओं में विरोध की लहर दौड़ गई है। पलामू प्रमंडल, जो बिहार, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से सटा है वहां भोजपुरी और मगही का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रभाव हमेशा से रहा है। इन भाषाओं में बड़ी आबादी पढ़ती-लिखती और संवाद करती है। इसके बावजूद इन्हें स्थानीय भाषा के रूप में मान्यता नहीं दी गई है।
युवा कांग्रेस नेता मणिकांत सिंह ने इस निर्णय को गैरवाजिब बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में सुधार की हमेशा गुंजाइश होती है। वे इस संबंध में मुख्यमंत्री और पार्टी के प्रदेश प्रभारी को पत्र लिखने वाले हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पलामू में कुडुख बोलने वालों की संख्या नगण्य है और इसे पढ़ाने वाले एकमात्र शिक्षक भी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ऐसे में इस भाषा को थोपना छात्रों के साथ अन्याय है।वहीं छात्र नेता कमलेश पांडेय ने इस फैसले को पलामू और गढ़वा के युवाओं के साथ सौतेला व्यवहार करार दिया।
उन्होंने कहा कि सरकार की नीति साफ तौर पर पक्षपातपूर्ण है जिससे छात्रों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों में असंतोष फैल रहा है। उन्होंने मांग की कि भोजपुरी मगही के साथ-साथ हिंदी को भी क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल किया जाए।पिछले वर्षों में भी इन जिलों में स्थानीय भाषा के मुद्दे को लेकर आंदोलन होते रहे हैं और अब एक बार फिर सरकार के इस निर्णय ने विरोध की चिंगारी को भड़का दिया है।
अब देखना यह है कि सरकार इस विरोध और मांगों पर क्या रुख अपनाती है या फिर छात्रों को एक बार फिर अपनी मातृभाषा के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा।

