स्टेन स्वामी की पुण्यतिथि पर फिर उठे सवाल न्यायिक प्रक्रिया और मानवाधिकारों पर छिड़ी बहस

5 जुलाई 2021 को सामाजिक कार्यकर्ता और जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी का निधन हुआ था। उनकी पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर एक बार फिर उनके मामले को लेकर न्यायिक प्रक्रिया मानवाधिकार और जांच एजेंसियों की जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है।
स्टेन स्वामी को भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से लगातार इनकार किया। स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद उन्हें लंबे समय तक नियमित जमानत नहीं मिली। बाद में इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां 5 जुलाई 2021 को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु तक अदालत ने उन्हें किसी भी आरोप में दोषी घोषित नहीं किया था और मामला विचाराधीन था।
इस मामले पर उस समय संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों कई विपक्षी नेताओं सामाजिक संगठनों और चर्च संस्थाओं ने चिंता जताई थी। वहीं केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों का कहना था कि पूरी कानूनी प्रक्रिया कानून के अनुसार चल रही थी तथा अदालतें स्वतंत्र रूप से निर्णय ले रही थीं।
बाद के वर्षों में डिजिटल फॉरेंसिक कंपनी Arsenal Consulting ने अपनी रिपोर्टों में दावा किया कि भीमा कोरेगांव मामले के कुछ आरोपियों के कंप्यूटर में बाहरी हस्तक्षेप के जरिए दस्तावेज़ डाले गए हो सकते हैं। हालांकि जांच एजेंसियों ने इन निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया और अपने आरोपों पर कायम रहीं। इस कारण यह मामला आज भी सार्वजनिक और कानूनी बहस का विषय बना हुआ है।
स्टेन स्वामी का मामला कई अहम सवाल भी छोड़ता है। इनमें गंभीर रूप से बीमार और बुजुर्ग अंडरट्रायल आरोपियों को चिकित्सा आधार पर जमानत देने की व्यवस्था लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों के समयबद्ध निपटारे और जांच एजेंसियों की जवाबदेही जैसे मुद्दे शामिल हैं।
आज भी उनके जीवन और विरासत को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। कुछ लोग उन्हें आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में याद करते हैं जबकि जांच एजेंसियों ने उन पर देशविरोधी गतिविधियों से जुड़े गंभीर आरोप लगाए थे जिन्हें उन्होंने अंत तक खारिज किया। उनका मामला भारतीय न्याय व्यवस्था कानूनी प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों पर जारी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

