49815

चीखते गांव, उजड़ते घर और मौत का बढ़ता आंकड़ा: 5 साल में हाथियों के हमलों में 474 लोगों की मौत, झारखंड में गहराया मानव-हाथी संघर्ष

खबर को शेयर करें
49815

झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। ताजा मामला कोडरमा जिले के डोमचांच थाना क्षेत्र के गोलगो गांव का है, जहां जंगली हाथियों के झुंड ने आधा दर्जन घरों में जमकर तोड़फोड़ कर दी। हालांकि इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन इलाके में दहशत का माहौल बना हुआ है। लगातार बढ़ रही ऐसी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि झारखंड में इंसानों और हाथियों के बीच टकराव अब भयावह रूप ले चुका है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच झारखंड में हाथियों के हमलों में 474 से अधिक लोगों की मौत हुई है। अकेले वर्ष 2023-24 में ही 87 लोगों की जान हाथियों के हमलों में चली गई। वहीं पिछले पांच वर्षों में 150 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिनमें कई लोग स्थायी रूप से दिव्यांग हो चुके हैं। मानव-हाथी संघर्ष के मामले में झारखंड देश के सबसे प्रभावित राज्यों में से एक बन गया है।

इस संघर्ष से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में रांची, खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा), पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर), सरायकेला-खरसावां, गुमला, लातेहार, बोकारो, धनबाद और कोडरमा शामिल हैं। रांची प्रमंडल में सबसे अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं।

मानव-हाथी संघर्ष की इस जंग में केवल इंसानों का ही नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि हाथियों की भी बड़ी संख्या में मौत हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में 5 हाथियों की मौत हुई थी, जबकि वर्ष 2022 के पहले आठ महीनों में 10 हाथियों ने जान गंवाई। वर्ष 2025 में भी दो हथिनियों की मौत दर्ज की गई। हाथियों की मौत के पीछे सबसे बड़ा कारण बिजली के करंट की चपेट में आना है। खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए गए अवैध बिजली के तार, लटकते हाई वोल्टेज तार, ट्रेन दुर्घटनाएं और जंगलों में लगाए गए विस्फोटक हाथियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

हाथियों के हमलों से जान-माल का भारी नुकसान भी हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में हाथियों के झुंड अक्सर धान, गन्ना और महुआ की फसलों को बर्बाद कर देते हैं। इसके अलावा भोजन की तलाश में घरों में घुसकर तोड़फोड़ भी करते हैं। वर्ष 2020 से 2025 के बीच राज्यभर में हजारों घर हाथियों के हमलों में क्षतिग्रस्त हुए हैं।

फसल क्षति के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2022-23 में 7,922 मामलों में लगभग 4.9 करोड़ रुपये, वर्ष 2023-24 में 11,087 मामलों में लगभग 5.6 करोड़ रुपये तथा वर्ष 2024-25 में 8,598 मामलों में लगभग 4.7 करोड़ रुपये मुआवजा वितरित किया गया। वहीं अनाज क्षति के मामलों में भी करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया है।

हाथियों के हमलों में मौत होने पर वर्तमान में झारखंड सरकार मृतक के परिजनों को 4 लाख रुपये का मुआवजा देती है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि यह राशि नुकसान के मुकाबले काफी कम है और इसके भुगतान में भी देरी होती है। राज्य सरकार अब इस मुआवजा राशि को बढ़ाकर 10 लाख रुपये करने पर विचार कर रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हाल ही में निर्देश दिया है कि हाथियों के हमलों से प्रभावित लोगों को 10 दिनों के भीतर मुआवजा उपलब्ध कराया जाए। इसके साथ ही घायल हाथियों के इलाज के लिए मोबाइल वेटरनरी यूनिट की व्यवस्था करने की भी योजना बनाई जा रही है।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड में बढ़ते अवैध खनन, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और एलीफेंट कॉरिडोर के बाधित होने के कारण हाथी अपने प्राकृतिक आवास से बाहर निकलने को मजबूर हो रहे हैं। जंगलों में भोजन और पानी की कमी होने पर वे गांवों की ओर रुख करते हैं, जिससे इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष बढ़ता जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जंगलों और हाथियों के प्राकृतिक रास्तों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है। ऐसे में केवल मुआवजा देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी नीति अपनाने की जरूरत है।