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रांची–पोटका के बाद अब जमशेदपुर! सोनारी से 3 साल के मासूम के अपहरण ने फिर खड़े किए सिस्टम पर सवाल || Special Report

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रांची में अंश–अंशिका, पोटका में चार माह का बच्चा और अब जमशेदपुर के सोनारी से तीन साल का मासूम..झारखंड में बच्चों की सुरक्षा पर सवाल अब इत्तेफाक नहीं बल्कि एक डरावनी कड़ी बनती जा रही है।

मंगलवार को जमशेदपुर के सोनारी थाना क्षेत्र में उस वक्त हड़कंप मच गया जब शांति सोरेन नामक महिला ने अपने करीब तीन वर्षीय बच्चे के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई। एक मां की आंखों के सामने से उसका बच्चा गायब हो जाए इससे बड़ा डर शायद कोई नहीं।

शिकायत मिलते ही सोनारी थाना पुलिस हरकत में आई। राहत की बात यह रही कि पुलिस की त्वरित कार्रवाई से बच्चे को कुछ ही समय में सकुशल बरामद कर लिया गया और उसे उसके परिजनों को सौंप दिया गया। मासूम सुरक्षित है यह खबर सुकून देती है लेकिन सवाल फिर भी खड़ा रह जाता है।

हर बार आख़िर तक आते-आते यही लाइन क्यों लिखनी पड़ती है कि
“बच्चा सुरक्षित मिला”?
क्या सिस्टम की जिम्मेदारी सिर्फ घटना के बाद एक्टिव होना रह गई है?

इस मामले में एक और मोड़ तब आया जब शांति सोरेन ने गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि उनके पति रोहित पासवान की हत्या हो चुकी है और अब ससुराल पक्ष उनकी जमीन हड़पने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने ससुर कारु पासवान पर अवैध शराब कारोबार और आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का भी आरोप लगाया।

एक तरफ अपहरण, दूसरी तरफ पारिवारिक विवाद, जमीन, दबदबा और डर और बीच में फंसा एक मासूम जिसे अभी दुनिया की साजिशों का मतलब भी नहीं पता।

बता दें कि रांची की राजधानी से 2 जनवरी को लापता हुए भाई-बहन अंश और अंशिका का मामला अब तक रहस्य बना हुआ है। बिस्किट खरीदने निकले ये बच्चे घर नहीं लौटे। सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए, पुलिस जांच चली, इनाम की राशि भी बढ़ाकर 2 लाख रुपये तक कर दी गई लेकिन अब तक बच्चों का कोई सुराग नहीं मिल सका। हर गुजरता दिन सिस्टम की नाकामी पर एक और सवाल जोड़ देता है।

वहीं पोटका में भीड़ का फायदा उठाकर चार माह के दुधमुंहे बच्चे का अपहरण कर लिया गया। भीड़, अफरा-तफरी और लापरवाही के बीच मासूम हाथों से फिसल गया और जब तक होश आता बच्चा गायब हो चुका था। यह घटना बताती है कि सार्वजनिक जगहों पर भी बच्चों की सुरक्षा कितनी कमजोर हो चुकी है।

और अब जमशेदपुर का सोनारी।

तीन अलग-अलग जगहें, अलग-अलग तारीखें, लेकिन कहानी एक जैसी बच्चे गायब, मां-बाप बदहवास और सिस्टम जांच के भरोसे।

सवाल अब और भी गहरे हो गए हैं!!

क्या झारखंड में बच्चों की सुरक्षा सच में प्राथमिकता है या सिर्फ फाइलों तक सीमित है?

क्या हर बार किसी मासूम के लापता होने के बाद ही सिस्टम जागेगा?

क्या रांची के अंश–अंशिका जैसे मामले हमें यह चेतावनी नहीं देते कि हर केस में “राहत की खबर” नहीं आती?

और अगर सोनारी में बच्चा समय पर नहीं मिलता तो क्या यह भी एक और अधूरी फाइल बन जाता?

और सबसे जरूरी सवाल क्या सरकार और सिस्टम हर बार “बरामद कर लिया गया” लिखवाकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलेंगे?

यह सिर्फ एक खबर नहीं है।
यह उन मां-बाप की रोज़ की दहशत है जो बच्चों का हाथ पकड़कर घर से निकलते हैं और हर कदम पर डरते हैं “पता नहीं मेरा बच्चा सुरक्षित लौटेगा या नहीं?”