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MUMBAI TRAIN BLAST: क्या एक झूठे गवाह ने 7/11 ब्लास्ट केस की पूरी जांच को डुबो दिया? कोर्ट के फैसले से ATS पर उठे सवाल…

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Azad Reporter desk: 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार धमाकों के मामले में मुंबई हाई कोर्ट का हालिया फैसला सुर्खियों में है। कोर्ट ने कहा कि आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने ऐसे गवाह पेश किए जिनकी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है। इन गवाहों की गलत और झूठी गवाही के चलते कोर्ट ने कई आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

कोर्ट में पेश किया गया गवाह नंबर 74 पहले भी कई मामलों में पुलिस का गवाह रह चुका है। उसने मकोका अदालत में बताया था कि उसने चर्चगेट स्टेशन पर दो संदिग्धों को काले बैग के साथ ट्रेन में चढ़ते हुए देखा था। इनमें से एक एहतेशाम सिद्दीकी था जिसे पुलिस ने ट्रेन में बम रखने का आरोपी बनाया।

लेकिन जब बचाव पक्ष ने गवाह से उस दिन चर्चगेट और दादर स्टेशन आने का कारण पूछा तो उसने जिन लोगों का नाम लिया वे उस दिन उस जगह पर मौजूद ही नहीं थे। इससे उसकी गवाही की सच्चाई पर गंभीर सवाल उठे।

कोर्ट ने फैसले में कहा कि एटीएस जैसे गंभीर मामलों में सच्चे और ठोस सबूत लाने में नाकाम रही। सिर्फ एक झूठी गवाही ने पूरे केस की नींव हिला दी।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन पक्ष की कई गंभीर गलतियों और कमजोरियों की वजह से आरोपियों को संदेह का लाभ मिला और उन्हें बरी करना पड़ा।

यह मामला देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े करता है कि क्या सच्चाई की जगह जल्दबाज़ी में आरोप साबित करने की कोशिश हो रही है?