1000213364

बिहार चुनाव से पहले बड़ा संकट! वोटर बने बिना हक कैसे मिलेगा? बिहार में वोट डालने के लिए मांगे गए 11 दस्तावेज,एक भी बनवाना आसान नहीं…

खबर को शेयर करें
1000213364

Azad Reporter desk: 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले बिहार के गांवों और कस्बों में वोटर लिस्ट के सत्यापन को लेकर हड़कंप मचा हुआ है। चुनाव आयोग ने साफ निर्देश दिया है कि 25 जुलाई तक वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए और इसके लिए हर नागरिक को अपने पास जरूरी दस्तावेजों में से कोई एक प्रस्तुत करना होगा।

लेकिन असलियत यह है कि राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हर नागरिक इन दस्तावेजों में से कोई एक भी आसानी से जुटा सके। 2003 की वोटर लिस्ट में जिनका नाम नहीं था ऐसे 2.93 करोड़ लोग इस बार खतरे में हैं कि वे वोट नहीं डाल पाएंगे।

विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ पार्टी के इशारे पर गरीब, दलित, पिछड़े और वंचित समाज के लोगों को जानबूझकर मतदान से दूर रखने की साजिश कर रहा है।

यह दस्तावेज है जरूरी—

  1. सरकारी कर्मचारी या पेंशनधारी को जारी पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश: बिहार में सरकारी सेवा में केवल 20.49 लाख लोग हैं जो कुल जनसंख्या का सिर्फ 1.57% है। जाहिर है बाकी 98% जनता इस श्रेणी में नहीं आती।
  2. 01 जुलाई 1987 से पहले किसी भी सरकारी संस्था/बैंक/डाकघर/एलआईसी/पीएसयू द्वारा जारी पहचान पत्र या दस्तावेज: इस श्रेणी में डाटा नहीं है और ग्रामीण जनता को यह साबित करना लगभग असंभव है कि 1987 से पहले उन्हें कोई ऐसा दस्तावेज जारी हुआ था।
  3. जन्म प्रमाणपत्र (Birth Certificate): बिहार में जन्म प्रमाणपत्र का रिकॉर्ड बहुत कमजोर है। 2000 में सिर्फ 3.7% जन्म ही दर्ज हुए थे। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी पंचायत सचिव या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से प्रमाणपत्र बनवाना बेहद कठिन है।
  4. पासपोर्ट: 2023 तक बिहार में सिर्फ 27.44 लाख वैध पासपोर्ट धारक थे यानी सिर्फ 2% लोग। बाकी जनता इस दस्तावेज से वंचित है।
  5. 10वीं या उससे ऊपर की शैक्षणिक प्रमाणपत्र: बिहार में सिर्फ 14.71% लोग 10वीं पास हैं। ड्रॉपआउट रेट भी 26% है। यानी अधिकतर लोगों के पास यह प्रमाणपत्र नहीं है।
  6. स्थायी निवास प्रमाण पत्र (Domicile Certificate): इसके लिए कई दस्तावेजों की जरूरत होती है और इसे बनवाने में कम से कम 15 दिन का समय लगता है। वेरिफिकेशन में देरी आम बात है।
  7. वन अधिकार प्रमाण पत्र (Forest Rights Certificate):बिहार में केवल 4,696 दावे हुए जिनमें से सिर्फ 191 को ही मंजूरी मिली। यह प्रमाण पत्र भी अधिकांश जनजातीय लोगों तक नहीं पहुंच पाया।
  8. जाति प्रमाण पत्र (OBC/SC/ST Certificate): हालांकि बड़ी संख्या में लोग OBC, EBC, SC-ST श्रेणी में आते हैं लेकिन सटीक आंकड़े नहीं हैं कि कितनों के पास वैध जाति प्रमाण पत्र है।
  9. नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) [जहां लागू हो]: बिहार में यह लागू नहीं है इसलिए यह दस्तावेज राज्य के लोगों के लिए अप्रासंगिक है।
  10. परिवार रजिस्टर (Family Register): इसे बनवाने के लिए व्यक्ति को पंचायत कार्यालय में आवेदन देना होता है और सभी दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही नाम जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया भी काफी समय लेती है।
  11. सरकार द्वारा जारी मकान या जमीन का आवंटन प्रमाण पत्र: 2011 की सामाजिक-आर्थिक जनगणना के अनुसार बिहार में 65.58% ग्रामीण परिवारों के पास कोई जमीन नहीं है, यानी ये प्रमाण पत्र भी अधिकांश लोगों के पास नहीं है।

क्या इतनी कठिन शर्तों के बीच आम जनता, खासकर गरीब, दलित और ग्रामीण तबका अपने लोकतांत्रिक अधिकार यानी वोट देने के अधिकार से वंचित रह जाएगा?